Hearing Loss: हर साल 10-15% केस हियरिंग लॉस के
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, रोजमर्रा की जिंदगी में तेज आवाजों के लगातार संपर्क में आने से 10-15% तक लोग सुनने की क्षमता खो रहे हैं। यह समस्या केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं है, बल्कि युवाओं और बच्चों में भी तेजी से बढ़ रही है।- मोबाइल पर तेज आवाज़ में लंबे समय तक हेडफोन/ईयरफोन का इस्तेमाल।
- शादी-ब्याह, जुलूस, पार्टियों में डीजे और लाउडस्पीकर।
- फैक्ट्री और ट्रैफिक का शोर।
बलरामपुर का मामला: डीजे की तेज आवाज से ब्रेन हेमरेज
पिछले साल बलरामपुर के 40 वर्षीय व्यक्ति के डीजे की तेज धुन के बाद ब्रेन हेमरेज से मौत ने सभी को चौंका दिया था। यह इकलौता केस नहीं है, बल्कि डॉक्टरों के अनुसार डीजे व लाउड स्पीकर की तेज धुन के बाद हार्ट अटैक व ब्रेन हेमरेज जैसे केस भी आने लगे हैं। आंबेडकर अस्पताल के ईएनटी विभाग में रोजाना 150 के आसपास मरीजों का इलाज किया जाता है। इनमें 10 से 15 मरीज हियरिंग लॉस वाले होते हैं। विशेष सीजन में इनकी संख्या बढ़कर दोगुनी हो जाती है। यह घटना बताती है कि शोर का असर सिर्फ कानों तक सीमित नहीं है, बल्कि जानलेवा भी हो सकता है।
15 से 20 मरीज रोजाना पहुंच रहे अस्पताल
राजधानी के डीकेएस सुपर स्पेशलिटी अस्पताल के न्यूरोलॉजी विभाग में ब्रेन हेमरेज से मिलते-जुलते केस लगातार सामने आ रहे हैं। डॉक्टरों का कहना है कि अभी तक किसी मरीज की मौत की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन तेज आवाज और ध्वनि प्रदूषण इसके पीछे प्रमुख कारण माने जा रहे हैं। कार्डियोलॉजी और मेडिसिन विभाग में भी ब्लड प्रेशर अप-डाउन के मरीज बड़ी संख्या में पहुंच रहे हैं। यहां रोजाना 15 से 20 मरीज शोर और तनाव से जुड़े लक्षणों के साथ इलाज के लिए आते हैं। वहीं, मेडिसिन और कार्डियोलॉजी की ओपीडी में रोजाना 500 से ज्यादा मरीज इलाज कराने पहुंचते हैं।Hearing Loss: हाईकोर्ट भी दे चुका है निर्देश
लगातार बढ़ते शोर प्रदूषण को देखते हुए हाईकोर्ट समय-समय पर कोलाहल अधिनियम के तहत दिशा-निर्देश जारी करता रहा है। डॉक्टरों के मुताबिक, कान के लिए 70 डेसिबल या इससे कम ध्वनि सुरक्षित मानी जाती है। सामान्य बातचीत की ध्वनि करीब 60 डेसिबल होती है।हाईकोर्ट ने दिया है तीन सप्ताह का समय
हाईकोर्ट ने सरकार को कोलाहल नियंत्रण अधिनियम लागू करने के लिए 3 सप्ताह का समय दिया है। नए नियमों के तहत 5 लाख रुपए तक की पेनाल्टी का प्रावधान किया जा रहा है। सरकार ने हाईकोर्ट को बताया है कि डीजे, वाहन-माउंटेड साउंड सिस्टम पर लेजर लाइट का उपयोग पहले से प्रतिबंधित है। उल्लंघन करने वालों पर कार्रवाई की जाएगी।शोर स्तर और खतरे
85 डेसिबल या इससे ज्यादा की ध्वनि से कान पर साइड इफेक्ट पड़ता है। वहीं 120 डेसिबल की आवाज़ से असुविधा हो सकती है। 140 डेसिबल से कान में दर्द हो सकता है। 120 डेसिबल की आवाज व्यक्ति या बच्चों को बहरा बना सकता है। पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (ईपीए) के अनुसार 24 घंटे में शोर का स्तर 70 डेसिबल से नीचे रहना चाहिए।कहां-कितने शोर की अनुमति
इलाके- दिन- रातरिहायशी – 55 – 45
साइलेंस जोन – 50 – 40
इंडस्ट्रियल – 75 – 70
कॉमर्शियल – 65 – 55
सोर्स- केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड
दिल और दिमाग पर असर
- हार्ट अटैक का खतरा: लगातार शोर से सिम्पैथेटिक नर्वस सिस्टम ज्यादा सक्रिय रहता है। इसका असर दिल पर पड़ता है और अचानक हार्ट अटैक की आशंका बढ़ जाती है।
- हाई ब्लड प्रेशर: 65 डेसिबल से ऊपर का शोर लंबे समय तक सहने से ब्लड प्रेशर बढ़ने लगता है।
- नींद की समस्या: नींद पूरी न होने से मानसिक तनाव, चिड़चिड़ापन और डिप्रेशन जैसी दिक्कतें।
- बच्चों पर असर: पढ़ाई के दौरान ध्यान की कमी और मानसिक विकास में बाधा।
क्या करें बचाव के लिए?
- ईयरफोन/हेडफोन का इस्तेमाल 60-60 नियम से करें (आवाज़ 60% से कम और 60 मिनट से ज्यादा नहीं)।
- सार्वजनिक समारोहों में तय सीमा से अधिक डीजे और लाउडस्पीकर न बजाएं।
- बच्चों और बुजुर्गों को तेज आवाज़ से बचाकर रखें।
- फैक्ट्री/वर्कशॉप जैसे स्थानों पर ईयरप्लग या इयरमफ जरूर इस्तेमाल करें।
- रात 10 बजे के बाद लाउडस्पीकर का इस्तेमाल पूरी तरह बंद होना चाहिए।