कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश का हवाला देते हुए कहा कि कारण लिखना केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि न्याय का आत्मा है। न्याय केवल किया ही न जाए, बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए। बिना कारण बताए आदेश मनमानेपन को जन्म देते हैं और पारदर्शिता व जवाबदेही के सिद्धांतों के खिलाफ हैं। दरअसल कुलश्रेष्ठ को 1987 में शाखा प्रबंधक स्केल-1 के पद पर नियुक्त किया गया था। जनवरी 2009 से फरवरी 2011 तक वे इंदरगढ़ शाखा में पदस्थ रहे। इस दौरान बैंक ने सरकारी गोदाम रसीदों पर ऋण देने की योजना शुरू की। आरोप है कि उन्होंने इस योजना के तहत ऋण स्वीकृत करते समय अनियमितताएं कीं। जुलाई 2011 में निलंबन के बाद विभागीय जांच हुई और मई 2013 में सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। अपील भी अक्टूबर 2013 में खारिज हो गई। याचिका में तर्क दिया कि जांच रिपोर्ट और नोटिस के जवाब में 9 मार्च 2013 को विस्तृत प्रत्युत्तर दिया था और 1 जुलाई 2013 की अपील में 23 पैराग्राफ में बिंदुवार जवाब दिया, लेकिन इन्हें आदेश में न तो दर्ज किया गया और न ही खारिज करने के कारण बताए गए।
कोर्ट का फैसला हाईकोर्ट ने 16 मई 2013 का बर्खास्तगी आदेश और 3 अक्टूबर 2013 का अपील आदेश रद्द करते हुए मामला अनुशासनात्मक प्राधिकारी को पुनर्विचार के लिए भेजा। प्राधिकारी को निर्देश दिया गया कि जांच रिपोर्ट और विस्तृत जवाब पर विधिसम्मत विचार करें। प्रत्येक आरोप पर कारणयुक्त और बोलते आदेश दें। व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर प्रदान करें। पूरी कार्यवाही तीन माह में पूरी की जाए।